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नूरपुर जन्माष्टमी: आस्था के बीच सियासी सरगर्मी और व्यवस्था पर उठे सवाल

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर नूरपुर में आयोजित राज्य स्तरीय धार्मिक समारोह भव्य सजावट, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह के साथ-साथ राजनीतिक सरगर्मी का भी केंद्र बन गया। एक ही दिन दो अलग-अलग पदयात्रा

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर नूरपुर में आयोजित राज्य स्तरीय धार्मिक समारोह भव्य सजावट, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह के साथ-साथ राजनीतिक सरगर्मी का भी केंद्र बन गया। एक ही दिन दो अलग-अलग पदयात्राओं के माध्यम से राजनीतिक गतिविधियां मंदिर तक पहुंचीं।

एक ओर विधायक श्री रणबीर सिंह और सांसद श्री राजीव भारद्वाज ने सैकड़ों समर्थकों के साथ न्याजपुर से स्वामी बृजराज मंदिर तक पदयात्रा निकालकर इसे जनसंपर्क और भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद का माध्यम बताया, वहीं दूसरी ओर पूर्व मंत्री श्री राकेश पठानिया ने अपने समर्थकों के साथ चौगान से मंदिर तक पदयात्रा निकाली और इसे श्रद्धा के साथ जनता से जुड़ने का अवसर बताया।

एक ही धार्मिक अवसर पर निकली इन दोनों पदयात्राओं ने जन्माष्टमी समारोह के बीच राजनीतिक चर्चाओं को भी हवा दे दी। स्थानीय स्तर पर इसे लेकर यह चर्चा तेज रही कि क्या धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की बढ़ती प्रवृत्ति उचित है? स्थानीय व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं के एक वर्ग का कहना है कि मंदिर और धार्मिक आयोजन सभी श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र होते हैं, इसलिए इन्हें राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनने से बचाया जाना चाहिए।

इसी बीच समारोह की भव्य सजावट और आकर्षक व्यवस्थाओं के बावजूद भीड़ प्रबंधन तथा श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर भी सवाल उठे। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना के बावजूद भीड़ को नियंत्रित करने, आवागमन को सुचारू रखने तथा छोटे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए सुविधाजनक एवं सुरक्षित व्यवस्था को लेकर लोगों ने सवाल खड़े किए।

सबसे गंभीर चर्चा उस कथित टिप्पणी को लेकर रही, जिसमें पुलिस विभाग के एक अधिकारी और मंदिर प्रशासन की ओर से मौजूद एक व्यक्ति द्वारा एक महिला से कहा गया कि “आप बच्चे को लेकर क्यों आए?”

यह सवाल इसलिए भी लोगों को खटका क्योंकि जन्माष्टमी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल के प्रकट होने का उत्सव है। ऐसे पर्व पर छोटे बच्चों के साथ आने वाले परिवारों को असुविधा महसूस कराने के बजाय उनके लिए बेहतर और सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध कराना आयोजन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

लोगों का कहना है कि यदि भीड़ अधिक थी या किसी स्थान पर सुरक्षा संबंधी परेशानी थी, तो प्रशासन को श्रद्धालुओं को समझाकर व्यवस्थित करना चाहिए था। व्यवस्था की कमी का समाधान श्रद्धालुओं से यह पूछना नहीं हो सकता कि वे बच्चे को लेकर क्यों आए। विशेष रूप से ऐसे धार्मिक आयोजन में प्रशासन और आयोजन समिति से संवेदनशील एवं सहयोगात्मक व्यवहार की अपेक्षा रहती है