हिमाचल प्रदेश को यूँ ही 'देवभूमि' नहीं कहा जाता। यहाँ के कण-कण में भगवान वास करते हैं। हर शहर और हर गाँव में आपको कोई न कोई प्राचीन मंदिर मिल जाएगा। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे रहस्यमयी और दिव्य स्थान के बारे में बता रहे हैं, जो भगवान शिव की पावन तपोभूमि है।

हम बात कर रहे हैं कुंजर महादेव की, जिसके बारे में कहा जाता है कि मणिमहेश की यात्रा तब तक अधूरी है, जब तक श्रद्धालु यहाँ आकर शीश नहीं नवाते।

📜 क्या है कुंजर महादेव से जुड़ी पौराणिक कथा?
लोककथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तो उन्होंने कुछ समय के लिए इस एकांत स्थान पर रुककर तपस्या की थी। कहते हैं कि भोलेनाथ ने एक विशाल शिला का रूप धारण किया और साधना में लीन हो गए।
उसी दौरान एक गड़रिया अपनी भेड़ें चराने वहाँ आया और आराम करने के लिए उसी शिला पर बैठकर अपनी दराती को धार देने लगा। जब उसने उठकर एक पेड़ को काटना चाहा, तो एक ही वार से मोटा पेड़ कट गया! गड़रिया हैरान रह गया। शाम को जब उसने उस पत्थर को उठाकर घर ले जाने की कोशिश की, तो वह उसे हिला तक नहीं पाया। गुस्से और जिद में उसने पत्थर पर प्रहार करना शुरू कर दिया, जिससे पत्थर में एक दरार आ गई।

प्रकट हुए भोलेनाथ: उसी क्षण भगवान शिव प्रकट हुए और गड़रिए को उसकी भूल का अहसास कराया। गड़रिया क्षमा मांगने लगा, तो भोलेनाथ ने उसे माफ तो कर दिया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि वह किसी को न बताए कि वे यहाँ तपस्या कर रहे हैं। गड़रिया वहाँ से गया, लेकिन उसने यह बात दूसरों को बता दी। नतीजतन, वह गड़रिया एक चट्टान में बदल गया और भगवान शिव वहाँ से कैलाश के लिए निकल पड़े।

कुंजर महादेव का 'चमत्कारी कुआँ'
उस स्थान पर आज भी खंडित शिला और भगवान शिव के पदचिह्न मौजूद हैं। इन पदचिह्नों के स्थान पर पानी एकत्रित हो जाता है, जो आज भी "कुंजर" पर्वतखंड पर एक कुएँ के रूप में स्थित है।
हैरानी की बात यह है कि इतनी अधिक ऊँचाई और टीले पर कुएँ का होना किसी चमत्कार से कम नहीं है! हर साल सावन या भादों के महीने में राधा अष्टमी के दिन यहाँ एक भव्य और पवित्र मेला लगता है। किवदंती है कि उस दिन कुएँ का पानी अचानक छलक उठता है, जिसमें स्नान करने मात्र से श्रद्धालुओं के सारे पाप धुल जाते हैं। भगवान शिव के इन पदचिह्नों की वजह से इस जगह का नाम 'पातका' भी पड़ गया है।

🚗 कैसे पहुँचे कुंजर महादेव? (यात्रा मार्ग)
यदि आप इस प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर जगह के दर्शन करना चाहते हैं, तो यह सफर बहुत ही आसान और रोमांचक है:
चरण 1: सबसे पहले पठानकोट (रेल मार्ग द्वारा) पहुँचें।
चरण 2: पठानकोट से लगभग 24 किलोमीटर दूर हिमाचल के नूरपुर के लिए बस लें।
चरण 3: नूरपुर से 22 किलोमीटर का सफर तय कर लाहड़ू पहुँचें।
चरण 4: लाहड़ू से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पातका के लिए बस, टैक्सी या निजी वाहन का इस्तेमाल करें।
चरण 5 (अंतिम पड़ाव): पातका से आगे 6 किलोमीटर की कच्ची सड़क या रोमांचक 3 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई पार करके आप सीधे कुंजर महादेव तक पहुँच सकते हैं।
सफर का अनुभव: जैसे-जैसे आप इस रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, हरी-भरी वादियाँ, घुमावदार खेत और खेतों में काम करते मेहनतकश लोग आपका मन मोह लेते हैं। ऊँचाई पर पहुँचने पर ऐसा महसूस होता है मानो आप सीधे बादलों की गोद में आ पहुँचे हों!
हर हर महादेव! जय भोले शंकर!