हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के ऐतिहासिक और प्रमुख क्षेत्र नूरपुर में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और लंबे समय से प्रशासनिक एवं राजनीतिक उपेक्षा का शिकार बने मातृ-शिशु अस्पताल (Mother and Child Hospital - MCH) के त्वरित संचालन की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।
रणजीत बख्शी जनकल्याण फाउंडेशन के निदेशक और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अकिल बख्शी के नेतृत्व में नूरपुर सिविल अस्पताल परिसर में शुरू हुआ यह अनिश्चितकालीन अनशन अब अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है।

यह आंदोलन महज़ एक इमारत को शुरू करने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्वतीय राज्य में स्वास्थ्य के अधिकार, प्रशासनिक जवाबदेही और आम जनता की बुनियादी जरूरतों के लिए एक बड़ी वैचारिक और सामाजिक लड़ाई बन चुका है।

2 अक्टूबर (गांधी जयंती) से शुरू हुई थी हुंकार
इस अनशन की शुरुआत महात्मा गांधी की जयंती यानी 2 अक्टूबर के पवित्र दिन पर सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए की गई थी।
शुरुआत में इसे एक सांकेतिक विरोध माना जा रहा था, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, नूरपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से हज़ारों की संख्या में लोग, महिलाएं, युवा और विभिन्न सामाजिक संगठन इस अनशन के समर्थन में सिविल अस्पताल परिसर में जुटने लगे हैं।

अकिल बख्शी ने अपने अनशन के दौरान स्पष्ट रूप से कहा है कि जब तक सरकार और प्रशासन इस बहुप्रतीक्षित मातृ-शिशु अस्पताल के दरवाजे जनता के लिए नहीं खोल देते और लिखित व ठोस आश्वासन नहीं मिल जाता, तब तक यह संघर्ष किसी भी कीमत पर थमेगा नहीं।

आंदोलनकारियों और स्थानीय जनता द्वारा प्रशासन के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख माँगे रखी गई हैं:
1. मातृ-शिशु अस्पताल (MCH) का तत्काल उद्घाटन: नूरपुर सिविल अस्पताल परिसर में करोड़ों रुपए की लागत से बनकर तैयार मातृ-शिशु अस्पताल का विंग पिछले कई सालों से धूल फांक रहा है और ताले में बंद है। प्रशासनिक सुस्ती के कारण गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

2. अस्पताल में डॉक्टरों और स्टाफ की भारी कमी दूर करना: आंकड़ों के अनुसार, नूरपुर सिविल अस्पताल में स्वीकृत पदों के मुकाबले आधे से भी कम डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ तैनात हैं। कई महत्वपूर्ण पद लंबे समय से खाली चल रहे हैं, जिससे मरीजों को मजबूरन टांडा या अन्य दूरदराज के अस्पतालों के लिए रैफर किया जाता है।

3. बंद पड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं की बहाली: अस्पताल में ब्लड बैंक की सेवाएं, पीएसए (PSA) ऑक्सीजन प्लांट, अल्ट्रासाउंड मशीनें और अन्य अत्याधुनिक चिकित्सीय उपकरण या तो बंद पड़े हैं या फिर ऑपरेटरों की कमी से जूझ रहे हैं।

4. रोगियों के अधिकारों की सुरक्षा: स्थानीय अस्पताल प्रबंधन समितियों (रोगी कल्याण समिति - RKS) में स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और नुमाइंदों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग भी जोर पकड़ रही है।

अब तक क्या-क्या हुआ? (क्रमानुसार घटनाक्रम)


शुरुआत और शंखनाद (2 अक्टूबर): गांधी जयंती के अवसर पर अकिल बख्शी ने सिविल अस्पताल परिसर में अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का आगाज़ किया, जिसके बाद क्षेत्र के कई सामाजिक कार्यकर्ता उनके साथ आ जुड़े।

नारी शक्ति का समर्थन (3 अक्टूबर - दूसरा दिन): आंदोलन के दूसरे दिन मिंजग्रां पंचायत की प्रधान सहित क्षेत्र की तमाम महिलाओं और महिला मंडलों ने खुलकर इस मांग का समर्थन किया और अस्पताल परिसर पहुंचकर अपनी एकजुटता दिखाई।

स्थानीय निकायों की चुप्पी पर प्रहार (4 अक्टूबर - तीसरा दिन): अनशन के तीसरे दिन अकिल बख्शी ने नूरपुर नगर परिषद और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कटाक्ष किया कि शहर के अन्य आयोजनों में आगे रहने वाले नुमाइंदे इस स्वास्थ्य आपातकाल पर चुप्पी साधे बैठे हैं, जबकि जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है।

नेताओं और जनप्रतिनिधियों का पहुंचना (5 अक्टूबर - चौथा दिन): अनशन के चौथे दिन स्थानीय राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई। कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नेताओं ने अनशन स्थल का दौरा किया तथा अकिल बख्शी से मुलाकात कर स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने अस्पताल के लंबित कार्यों को प्राथमिकता से पूरा करवाने और आरकेएस (RKS) समिति से जुड़े मुद्दों को उच्चाधिकारियों के समक्ष उठाने का आश्वासन दिया।

पाँचवाँ दिन और बढ़ता दबाव: आज अनशन का पाँचवाँ दिन है। जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। आम जनता का हुजूम अब अस्पताल परिसर में जुटने लगा है और हर तरफ एक ही मांग गूंज रही है कि अस्पताल के ताले तुरंत खोले जाएं।

स्थानीय निकायों और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल
इस आंदोलन के दौरान अकिल बख्शी ने स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और विशेष रूप से नूरपुर नगर परिषद की कार्यशैली पर कड़े प्रहार किए हैं। उनका कहना है कि जब आम जनता और गर्भवती महिलाएं बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अस्पताल के बाहर दर-दर भटक रही हैं और संघर्ष कर रही हैं, तब स्थानीय नुमाइंदों और पार्षदों की चुप्पी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि शहर में अन्य उत्सवों और आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले जनप्रतिनिधियों को इस गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल पर भी उतनी ही गंभीरता दिखानी चाहिए और खुद आगे आकर इस अस्पताल का फीता काटकर इसे जनता को समर्पित करना चाहिए।

नारी शक्ति और जन समर्थन का सैलाब
नूरपुर के इस संघर्ष में नारी शक्ति की भूमिका सबसे आगे रही है। विभिन्न पंचायतों की प्रधानों, महिला मंडलों और स्थानीय महिलाओं ने बढ़-चढ़कर इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। महिलाओं का साफ तौर पर कहना है कि प्रसव के दौरान ग्रामीण इलाकों की माताओं को आने वाली दिक्कतों का दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यदि समय पर मातृ-शिशु अस्पताल शुरू हो जाता, तो कई माताओं और बच्चों की जान बचाई जा सकती थी।


जैसे-जैसे भूख हड़ताल का यह पाँचवाँ दिन आगे बढ़ रहा है, प्रशासन और पुलिस के हाथ-पांव फूलने लगे हैं। एसडीएम (SDM) नूरपुर और मेडिकल सुपरिंटेंडेंट (MS) लगातार अनशनकारियों और प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत के दौर चला रहे हैं, ताकि किसी तरह बीच का रास्ता निकाला जा सके और स्थिति को संभाला जा सके।

दूसरी ओर, सिविल अस्पताल परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं, लेकिन आम जनता का गुस्सा जिस तरह उफान पर है, उसे देखते हुए सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर शीघ्र ही कोई बड़ा और सकारात्मक निर्णय लेने का भारी दबाव बन गया है।

📢 आंदोलन के गूंजते प्रमुख नारे (Slogans)
"जब तक अस्पताल के नहीं खुलेंगे ताले, चैन से नहीं बैठेंगे नूरपुर वाले!"
"स्वास्थ्य सेवा भीख नहीं, जनता का अधिकार है!"
"अकिल बख्शी संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं!"
"कब जागेगी सरकार? नूरपुर मांगे अधिकार!"