एक चरवाहे की मन्नत और माता का हुक्म (1942)
इस पावन स्थान की गाथा वर्ष 1942 से शुरू होती है। गद्दी समुदाय का एक चरवाहा अपनी भेड़-बकरियों को चराते हुए इस पहाड़ी पर पहुँचा। अचानक उसकी पूरी रेवड़ (भेड़-बकरियाँ) आँखों के सामने से ओझल हो गईं। घने जंगलों और दुर्गम रास्तों के बीच बेबस होकर उसने अपने पास मौजूद माता बन्नी के पवित्र त्रिशूल को भूमि पर स्थापित किया और अश्रुपूरित नेत्रों से प्रार्थना की।
मान्यता है कि उसी क्षण माता ने उसे दिव्य हुक्म दिया:
"हे भक्त, घबराओ मत! मेरी कृपा से तुम्हारी भेड़-बकरियाँ सुरक्षित मिल जाएँगी। इस पहाड़ी पर मेरा एक धाम बनाओ और मुझे 'रत्ते घर वाली' के नाम से पुकारो।"
प्रार्थना समाप्त होते ही उसकी गुम हुई सभी भेड़-बकरियाँ सकुशल लौट आईं। इसी दैवीय अनुभव के बाद गद्दी समुदाय और स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर इस पहाड़ी पर माता के मंदिर की स्थापना की।
श्रद्धा का सफर: पगडंडियों से आधुनिक धाम तक
एक दौर था जब श्रद्धालु माता के दर्शनों के लिए बीहड़ और पथरीली पगडंडियों पर मीलों पैदल चलकर पहुँचते थे। जैसे-जैसे भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती गईं, माता की महिमा दूर-दूर तक फैलती गई।
सुदृढ़ व्यवस्था: आज स्थानीय ग्रामीणों और सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों द्वारा गठित मंदिर प्रबंधन कमेटी इस धाम की देखभाल करती है। अब यह स्थान पक्की सड़कों, निर्बाध बिजली और स्वच्छ जल आपूर्ति जैसी सुविधाओं से सुसज्जित है।
अंतरराज्यीय आस्था: केवल हिमाचल ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों—पंजाब और जम्मू-कश्मीर से भी हर रोज सैकड़ों भक्त अपनी झोली फैलाने यहाँ आते हैं।
नवरात्रि में आस्था का सैलाब और विशाल भंडारा
चैत्र और आश्विन नवरात्रि के दौरान यह पहाड़ी पूरी तरह भक्तिमय हो जाती है। पूरे 9 दिनों तक यहाँ भव्य मेले का माहौल रहता है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि जिसने भी सच्चे निष्कपट मन से 'माता रत्ते घर वाली' के चरणों में शीश नवाया है, माँ ने उसकी हर मुराद पूरी की है।
